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पंडरी स्थित ग्राम सेवा समिति ट्रस्ट के बेशकीमती करोड़ों के जमीन का नामांतरण आवेदन खारिज बबीता अग्रवाल पति हरिवल्लभ अग्रवाल ने तहसीलदार में लगाया था नामांतरण आवेदन

ट्रस्ट की जमीन के कथित फर्जी विनिमय विलेख पर तहसीलदार की सख्त टिप्पणी, आपत्ति स्वीकार कर नामांतरण आवेदन निरस्त

चमन प्रकाश केयर (कुर्रे)

रायपुर। रायपुर शहर के प्रतिष्ठित एवं वर्ष 1953 से पंजीकृत बताए जा रहे ग्राम सेवा समिति ट्रस्ट की पंडरीतराई स्थित भूमि को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर सामने आया है। ट्रस्ट की बेशकीमती भूमि के संबंध में प्रस्तुत नामांतरण आवेदन को तहसीलदार रायपुर द्वारा निरस्त किए जाने के बाद मामले में ट्रस्ट की संपत्तियों के अधिकार, विलेखों की वैधानिकता तथा कथित रूप से ट्रस्ट के नाम पर किए गए लेन-देन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

मामले के अनुसार, पंडरी क्षेत्र में स्थित ट्रस्ट की भूमि के संबंध में अजय तिवारी और बबीता अग्रवाल पति हरिवल्लभ अग्रवाल के बीच एक विनिमय विलेख पंजीकृत कराया गया था। इसी विनिमय विलेख के आधार पर बबीता अग्रवाल की ओर से भूमि के नामांतरण के लिए तहसीलदार रायपुर के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया गया। आवेदन के बाद अधिवक्ता एवं समाजसेवी महंत राम आशीष दास तथा ग्राम सेवा समिति से जुड़े बुनकरों की ओर से आपत्ति प्रस्तुत की गई और नामांतरण आवेदन को निरस्त करने की मांग की गई।

आपत्तिकर्ताओं की ओर से प्रस्तुत दस्तावेजों में मुख्य रूप से यह सवाल उठाया गया कि जिस व्यक्ति द्वारा ट्रस्ट की संपत्ति से संबंधित विलेख निष्पादित किया गया, उसे ट्रस्ट की संपत्ति के संबंध में ऐसा निर्णय लेने अथवा विलेख करने का वैधानिक अधिकार प्राप्त था या नहीं। आपत्ति में यह भी कहा गया कि अजय तिवारी ग्राम सेवा समिति के वैध ट्रस्टी नहीं रहे हैं और इसके बावजूद ट्रस्ट की संपत्तियों के संबंध में ट्रस्टी के रूप में उनका नाम दर्ज कराया गया।

रजिस्ट्रार एवं एसडीएम की अनुमति का मुद्दा

मामले में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु ट्रस्ट की संपत्ति के हस्तांतरण से जुड़ी अनुमति को लेकर सामने आया। आपत्तिकर्ताओं के अनुसार, लोक न्यास की संपत्ति के विक्रय, दान, लीज अथवा विनिमय जैसे मामलों में संबंधित वैधानिक प्रक्रिया एवं सक्षम प्राधिकारी की अनुमति आवश्यक होती है। उनका आरोप है कि संबंधित विनिमय विलेख के निष्पादन से पहले आवश्यक अनुमति प्राप्त नहीं की गई।

तहसीलदार के समक्ष प्रस्तुत आपत्तियों और दस्तावेजों पर विचार करते हुए यह मुद्दा भी सामने आया कि यदि विलेख निष्पादित करने वाले व्यक्ति को ट्रस्ट की संपत्ति के संबंध में वैधानिक अधिकार ही प्राप्त नहीं था और आवश्यक अनुमति भी नहीं ली गई थी, तो ऐसे विलेख के आधार पर नामांतरण किया जाना विधिसम्मत होगा या नहीं।

तहसीलदार ने आपत्ति स्वीकार कर आवेदन किया निरस्त

प्रकरण में उपलब्ध दस्तावेजों एवं आपत्तियों पर विचार करने के बाद तहसीलदार रायपुर ने बबीता अग्रवाल द्वारा प्रस्तुत नामांतरण आवेदन को निरस्त कर दिया। आदेश में आपत्तिकर्ताओं द्वारा उठाए गए प्रमुख बिंदुओं को स्वीकार किया गया तथा ट्रस्ट की संपत्ति से संबंधित विलेख की वैधानिकता पर सवालों को महत्वपूर्ण माना गया।

इस निर्णय के बाद ट्रस्ट की पंडरीतराई स्थित भूमि के कथित विनिमय को लेकर चल रही प्रक्रिया पर फिलहाल रोक लग गई है। नामांतरण आवेदन खारिज होने से यह भी स्पष्ट हुआ कि केवल पंजीकृत विलेख के आधार पर भूमि का नामांतरण स्वतः स्वीकार नहीं किया जा सकता, बल्कि संबंधित पक्ष के अधिकार और आवश्यक वैधानिक प्रक्रियाओं की भी जांच की जा सकती है।

ट्रस्ट की अन्य संपत्तियों को लेकर भी उठते रहे हैं सवाल

मामले से जुड़े लोगों का आरोप है कि ग्राम सेवा समिति की अन्य संपत्तियों को लेकर भी पूर्व में विवाद सामने आ चुके हैं। विशेष रूप से आमासिवनी क्षेत्र स्थित ट्रस्ट की भूमि के संबंध में भी कथित अनियमितताओं और हस्तांतरण को लेकर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित सक्षम अभिलेखों एवं न्यायिक/प्रशासनिक रिकॉर्ड से किया जाना आवश्यक है।

आपत्तिकर्ताओं का कहना है कि वर्ष 1953 से अस्तित्व में बताए जा रहे ट्रस्ट की संपत्तियां केवल किसी व्यक्ति विशेष की निजी संपत्ति नहीं हैं, बल्कि उनका उपयोग ट्रस्ट के घोषित उद्देश्यों के अनुरूप होना चाहिए। इसलिए ट्रस्ट की जमीन से संबंधित प्रत्येक लेन-देन में पारदर्शिता और निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।

आगे भी सामने आ सकते हैं दस्तावेज

तहसीलदार द्वारा नामांतरण आवेदन निरस्त किए जाने के बाद अब पूरे मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया पर भी निगाहें टिकी हैं। संबंधित पक्ष आदेश के विरुद्ध सक्षम राजस्व अथवा न्यायिक मंच पर अपना पक्ष रख सकते हैं। वहीं, ट्रस्ट की संपत्तियों से जुड़े पुराने दस्तावेज, ट्रस्ट की पंजीयन स्थिति, ट्रस्टी नियुक्ति संबंधी रिकॉर्ड तथा पूर्व में किए गए भूमि हस्तांतरणों की वैधानिकता की जांच की मांग भी उठ सकती है।

मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि ट्रस्ट की संपत्ति से संबंधित विलेख किसके अधिकार से निष्पादित किया गया, संबंधित व्यक्ति को ट्रस्टी के रूप में मान्यता प्राप्त थी या नहीं और संपत्ति के विनिमय से पहले आवश्यक वैधानिक अनुमति ली गई थी या नहीं। तहसीलदार द्वारा नामांतरण आवेदन निरस्त किए जाने के बाद अब इन सवालों के दस्तावेजी जवाब सामने आना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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