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फर्जी ट्रांसफर आदेश का खेल? स्वास्थ्य विभाग में दस्तावेजों से कथित छेड़छाड़ पर पलारी पुलिस ने किया FIR, रोहांसी के RMA अधिकारी करण कुमार देवांगन समेत अन्य के खिलाफ कई गंभीर धाराओं मे अपराध दर्ज

चमन प्रकाश केयर (कुर्रे)

बलौदाबाजार। स्वास्थ्य विभाग के सरकारी दस्तावेजों और अधिकारियों के हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता को लेकर बलौदाबाजार जिले के पलारी से एक गंभीर मामला सामने आया है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र रोहांसी में पदस्थ ग्रामीण चिकित्सा स्वास्थ्य अधिकारी करण कुमार देवांगन के नाम से सामने आए कथित स्थानांतरण आदेश को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि मामला अब सीधे पुलिस थाने तक पहुंच गया है। पलारी पुलिस ने इस मामले में FIR क्रमांक 0347/2026 दर्ज कर भारतीय न्याय संहिता की कई गंभीर धाराओं के तहत जांच शुरू कर दी है। FIR में करण कुमार देवांगन एवं अन्य का नाम आरोपी के रूप में दर्ज है।


मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिस दस्तावेज को कथित तौर पर सरकारी स्थानांतरण आदेश के रूप में प्रस्तुत किया गया, उसमें मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, जिला बलौदाबाजार-भाटापारा के हस्ताक्षर का इस्तेमाल किया गया था। स्वास्थ्य विभाग की ओर से उपलब्ध दस्तावेज में स्पष्ट उल्लेख है कि संबंधित कार्यालय द्वारा ऐसा आदेश जारी नहीं किया गया था और सामने आया आदेश प्रथम दृष्टया फर्जी पाया गया। दस्तावेज में यह भी कहा गया कि फर्जी आदेश के संबंध में तत्काल नियमानुसार कार्रवाई की आवश्यकता है।

17 अगस्त को सामने आया पूरा मामला

मामले की शुरुआत 17 अगस्त 2026 को बताई जा रही है। उपलब्ध शिकायत एवं FIR के अनुसार, ग्रामीण चिकित्सा स्वास्थ्य अधिकारी करण कुमार देवांगन कथित स्थानांतरण आदेश लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र रोहांसी से कार्यमुक्त होने की प्रक्रिया के लिए संबंधित अधिकारियों के पास पहुंचे थे।

बताया गया कि आदेश में उन्हें रोहांसी से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मोपर, विकासखंड भाटापारा में स्थानांतरित किए जाने का उल्लेख था। लेकिन आदेश को देखने के बाद संबंधित अधिकारियों को इसकी प्रामाणिकता पर संदेह हुआ। इसके बाद आदेश की सत्यता की जांच के लिए इसे उच्च अधिकारियों के संज्ञान में लाया गया।

स्वास्थ्य विभाग से जुड़े दस्तावेजों में उल्लेख है कि कथित आदेश में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के कार्यालय के एक पुराने आदेश क्रमांक का हवाला दिया गया था। इसी संदर्भ को देखकर दस्तावेज की जांच की गई तो कथित स्थानांतरण आदेश पर लगे हस्ताक्षर और आदेश की वैधता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए। विभागीय स्तर पर इसे फर्जी आदेश माना गया और पुलिस कार्रवाई के लिए सूचना दी गई।

असली सवाल—सरकारी आदेश बना कैसे?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि विभाग का दावा सही है और ऐसा कोई स्थानांतरण आदेश जारी ही नहीं हुआ था, तो फिर यह दस्तावेज तैयार कैसे हुआ? कथित आदेश में विभागीय भाषा, आदेश क्रमांक, तारीख और अधिकारी के हस्ताक्षर जैसी औपचारिक चीजों का इस्तेमाल किया गया। ऐसे में पुलिस जांच के सामने कई अहम सवाल हैं—क्या किसी पुराने सरकारी आदेश की कॉपी लेकर नया दस्तावेज तैयार किया गया? क्या किसी सरकारी रिकॉर्ड से जानकारी लेकर कथित फर्जी आदेश बनाया गया? क्या हस्ताक्षर की नकल की गई? और यदि ऐसा किया गया तो इसके पीछे कौन-कौन लोग शामिल थे? यही वजह है कि यह मामला केवल एक कर्मचारी के स्थानांतरण से जुड़ा विवाद नहीं रह गया है, बल्कि सरकारी दस्तावेजों की विश्वसनीयता और कार्यालयीन प्रक्रिया की सुरक्षा से भी जुड़ गया है।

बीएमओ की शिकायत के बाद पुलिस तक पहुंचा मामला

उपलब्ध FIR में दर्ज विवरण के अनुसार, पलारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के खंड चिकित्सा अधिकारी डॉ. पंकज वर्मा के बयान और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर मामले की जानकारी पुलिस तक पहुंची। FIR में उल्लेख है कि कथित फर्जी आदेश की प्रति के साथ करण देवांगन द्वारा कार्यमुक्त किए जाने संबंधी आवेदन प्रस्तुत किया गया था।

जांच के दौरान शिकायतकर्ता पक्ष ने आरोप लगाया कि कथित आदेश में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के फर्जी हस्ताक्षर किए गए तथा उस दस्तावेज का वास्तविक सरकारी आदेश की तरह इस्तेमाल करने का प्रयास किया गया। FIR के अनुसार, इसी आधार पर मामले में अपराध पंजीबद्ध किया गया।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि FIR में दर्ज आरोप अभी पुलिस जांच का विषय हैं। किसी व्यक्ति की दोषसिद्धि केवल FIR दर्ज होने से नहीं होती। पुलिस जांच, दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही आरोपों की अंतिम स्थिति स्पष्ट होगी।

थाना प्रभारी का बयान —सूचना पत्र के आधार पर जांच शुरू

इस पूरे मामले में थाना प्रभारी का कहना है कि बीएमओ डॉ. पंकज वर्मा ने उच्च अधिकारी डॉ. राजेश अवस्थी, बलौदाबाजार के पत्र का हवाला देते हुए जांच एवं कार्रवाई के लिए सूचना दी थी। इसी सूचना पत्र के आधार पर पुलिस ने जांच की कार्रवाई शुरू की है।

यानी फिलहाल पुलिस के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौती कथित आदेश की उत्पत्ति और उसकी पूरी कड़ी को सामने लाने की है।

FIR में लगीं कई धाराएं

पलारी पुलिस ने मामले में भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 3(5), 318(4), 336(3), 337, 338 और 340(2) के तहत अपराध दर्ज किया है। इससे साफ है कि पुलिस जांच केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है और कथित दस्तावेज तैयार करने या उसके इस्तेमाल में किसी अन्य की भूमिका सामने आती है या नहीं, यह भी जांच का हिस्सा रहेगा।

सिर्फ ट्रांसफर का मामला नहीं, दस्तावेजों की सुरक्षा पर भी सवाल

इस मामले ने स्वास्थ्य विभाग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। अगर कोई व्यक्ति किसी सरकारी विभाग के नाम से ऐसा आदेश तैयार कर ले, जिसमें कार्यालयीन क्रमांक, तारीख और वरिष्ठ अधिकारी के हस्ताक्षर का इस्तेमाल हो, तो यह सिर्फ व्यक्तिगत लाभ का मामला नहीं माना जा सकता। सरकारी कार्यालयों में स्थानांतरण आदेश केवल कागज का एक टुकड़ा नहीं होता। उसके आधार पर कर्मचारी कार्यमुक्त होता है, नई जगह पदभार ग्रहण करता है और विभागीय रिकॉर्ड में उसकी स्थिति बदलती है। ऐसे में यदि कोई कथित फर्जी आदेश इस प्रक्रिया में इस्तेमाल किया जाता है, तो इससे प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा असर पड़ सकता है।

यही वजह है कि इस मामले में पुलिस जांच के साथ-साथ विभागीय स्तर पर भी यह देखना जरूरी होगा कि कथित दस्तावेज तैयार करने वाले व्यक्ति तक जानकारी कैसे पहुंची और क्या विभागीय रिकॉर्ड या आदेशों का किसी स्तर पर दुरुपयोग हुआ।

क्या किसी पुराने आदेश को आधार बनाकर तैयार किया गया दस्तावेज?

दस्तावेजों में जिस सरकारी आदेश क्रमांक और तारीख का उल्लेख किया गया है, उसके आधार पर कथित फर्जी आदेश की सत्यता पर सवाल उठे। उपलब्ध विभागीय पत्र में कहा गया है कि संबंधित कार्यालय द्वारा उक्त आदेश जारी नहीं किया गया था और उसे फर्जी बताया गया।

अब पुलिस के लिए यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि कथित दस्तावेज किस कंप्यूटर, मोबाइल या अन्य माध्यम से तैयार हुआ। उसके निर्माण की तारीख क्या थी? उसे किसने प्रिंट कराया? उस पर हस्ताक्षर की नकल किस तकनीक से की गई? और सबसे महत्वपूर्ण—यह दस्तावेज सबसे पहले किसके पास था? यदि पुलिस इन सवालों के जवाब तक पहुंचती है तो पूरे मामले की तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है।

CMHO डॉ. राजेश अवस्थी का पक्ष जानने की कोशिश

मामले में जिस अधिकारी के हस्ताक्षर कथित रूप से फर्जी तरीके से इस्तेमाल किए जाने का आरोप है, वे हैं मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. राजेश अवस्थी, बलौदाबाजार से इस खबर के संबंध में उनका पक्ष जानने के लिए फोन और मैसेज के माध्यम से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन खबर लिखे जाने तक उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई। ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारी का पक्ष बेहद महत्वपूर्ण है, इसलिए उनका जवाब प्राप्त होने पर उसे प्राथमिकता के साथ आगे और प्रकाशित किया जाएगा।

पुलिस जांच के सामने कई अहम चुनौतियां

अब पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि कथित फर्जी आदेश की पूरी कड़ी कहां से शुरू हुई और कहां तक पहुंची। जांच में कथित आदेश की मूल प्रति, विभागीय रिकॉर्ड, हस्ताक्षर के नमूने, कार्यालयीन पत्राचार, संबंधित आवेदन और उस दौरान हुई बातचीत की पड़ताल महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि पुलिस जरूरत समझती है तो दस्तावेज की तकनीकी अथवा विशेषज्ञ जांच भी कराई जा सकती है।

साथ ही यह भी देखा जाएगा कि कथित आदेश को लेकर किन-किन अधिकारियों या कर्मचारियों से संपर्क किया गया था और क्या किसी अन्य व्यक्ति ने इसे सरकारी आदेश मानकर प्रक्रिया आगे बढ़ाई।

  • सुलगते सवाल – इस मामले ने कई सवाल छोड़ दिए हैंअगर आदेश फर्जी था तो तैयार किसने किया? सरकारी अधिकारी के हस्ताक्षर की नकल कैसे हुई? किस उद्देश्य से कथित स्थानांतरण आदेश तैयार किया गया? क्या यह केवल स्थानांतरण कराने का प्रयास था या इसके पीछे कोई बड़ा प्रशासनिक खेल था? कथित आदेश बनाने के लिए विभागीय जानकारी कहां से हासिल हुई? क्या इस पूरे मामले में एक से अधिक लोगों की भूमिका है? इन सवालों के जवाब पुलिस जांच से सामने आने हैं।

फिलहाल FIR, आगे जांच का इंतजार

उपलब्ध दस्तावेजों से इतना स्पष्ट है कि पलारी थाने में इस मामले को लेकर FIR क्रमांक 0347/2026 दर्ज हो चुकी है और पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। FIR में कई धाराएं लगाई गई हैं तथा करण कुमार देवांगन एवं अन्य को आरोपी के तौर पर दर्ज किया गया है। असली सवाल FIR दर्ज होने से आगे शुरू होता है—कथित फर्जी आदेश बना कैसे, किसने बनाया और उसके पीछे वास्तविक उद्देश्य क्या था?कारी दस्तावेजों की सुरक्षा और उनके दुरुपयोग को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

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