
मुख्यधारा से जुड़ने और रायपुर के बड़े मंच पर हुनर दिखाने का अवसर देने पर जताया आभार, हथकरघा प्रशिक्षण और स्वरोजगार से जोड़ने की पहल
चमन प्रकाश केयर (कुर्रे)
रायपुर। बस्तर के सुकमा जिले के चिंतलनार क्षेत्र से निकलकर आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा से जुड़ने की राह पर आगे बढ़ रहीं महिला नक्सलियों के लिए रायपुर की यह यात्रा केवल एक शहर तक पहुंचने का सफर नहीं, बल्कि उनके जीवन में नई उम्मीद और नए अवसरों की शुरुआत बनकर सामने आई। पहली बार रायपुर पहुंचीं इन महिलाओं ने ग्रामोद्योग विभाग के सचिव एवं आईएएस अधिकारी श्री राजेश सिंह राणा से उनके रायपुर स्थित निवास पर मुलाकात की और उनके परिवार के साथ आत्मीय समय बिताया।
इस दौरान महिलाओं ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि बस्तर के जंगलों और सुकमा के चिंतलनार जैसे दूरस्थ क्षेत्र से निकलकर पहली बार उन्हें रायपुर आने और बड़े मंच पर अपनी प्रतिभा प्रस्तुत करने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि उन्हें सुकमा से रायपुर लाकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ने तथा उनके भीतर मौजूद हुनर को पहचान दिलाने की दिशा में किए जा रहे प्रयास उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
“पहली बार रायपुर आए हैं, आपने हमें नई राह दिखाई”

आत्मसमर्पित महिलाओं ने कहा कि उन्होंने अब तक अपना जीवन बस्तर के जंगलों और सीमित संसाधनों के बीच बिताया है। रायपुर जैसे बड़े शहर में आकर अपने हुनर को लोगों के सामने प्रस्तुत करने का अवसर उनके लिए एक नया अनुभव है।
महिलाओं ने श्री राजेश सिंह राणा के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सुकमा से रायपुर तक लाकर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने और बड़े मंच पर अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर देने से उनके भीतर आत्मविश्वास बढ़ा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में वे अपने हुनर को रोजगार और आत्मनिर्भरता का माध्यम बना सकेंगी।
परिवार के साथ बिताया आत्मीय समय

मुलाकात के दौरान आत्मसमर्पित महिला नक्सलियों ने श्री राजेश सिंह राणा के परिवार के सदस्यों के साथ भी समय बिताया। इस दौरान माहौल पूरी तरह आत्मीय और सहज रहा। यह मुलाकात सामाजिक पुनर्वास और मुख्यधारा में वापसी के मानवीय पक्ष को भी सामने लेकर आई।
श्री राणा ने महिलाओं से बातचीत कर उनके अनुभव, रुचियों और भविष्य की आकांक्षाओं के बारे में जानकारी ली। उन्होंने सभी महिलाओं को विश्व आदिवासी दिवस की बधाई एवं शुभकामनाएं दीं और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

हुनर को रोजगार से जोड़ने की तैयारी
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के मार्गदर्शन में आत्मसमर्पित महिलाओं को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने और उन्हें सम्मानजनक आजीविका उपलब्ध कराने की दिशा में ग्रामोद्योग विभाग द्वारा पहल की जा रही है।

इसी क्रम में ग्रामोद्योग विभाग के सचिव श्री राजेश सिंह राणा ने विभागीय अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि इन सभी महिलाओं की रुचि और क्षमता के आधार पर हथकरघा प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए। हथकरघा प्रशिक्षण के माध्यम से महिलाओं को हाथ से चलने वाले करघे पर कपड़ा बुनने सहित पारंपरिक बुनकरी की तकनीकों से प्रशिक्षित किया जाएगा।
प्रशिक्षण के साथ-साथ महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से करघे उपलब्ध कराने की दिशा में भी कार्य किया जाएगा। इसका उद्देश्य केवल प्रशिक्षण देना नहीं, बल्कि प्रशिक्षण के बाद महिलाओं को अपनी आजीविका शुरू करने के लिए आवश्यक साधन उपलब्ध कराना है।
आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेंगे कदम
ग्रामोद्योग विभाग की इस पहल से आत्मसमर्पित महिलाओं को उनके पारंपरिक कौशल और रुचि के अनुरूप रोजगार का अवसर मिल सकेगा। हथकरघा क्षेत्र से जुड़कर वे अपने उत्पाद तैयार कर सकेंगी और भविष्य में इन्हें बाजार तक पहुंचाने की संभावनाएं भी विकसित की जा सकती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, आत्मसमर्पण के बाद पुनर्वास की प्रक्रिया में केवल आर्थिक सहायता ही पर्याप्त नहीं होती। व्यक्ति को सम्मान, कौशल, रोजगार और समाज में अपनी पहचान बनाने का अवसर मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। ऐसे में हथकरघा प्रशिक्षण और स्वरोजगार से जोड़ने की यह पहल आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
बस्तर की प्रतिभा को मिलेगा बड़ा मंच
चिंतलनार की इन महिलाओं के लिए रायपुर यात्रा ने यह संदेश भी दिया है कि बस्तर के दूरस्थ इलाकों में मौजूद हुनर को उचित अवसर और मंच मिलने पर वह प्रदेश और देश के सामने अपनी पहचान बना सकता है।

सुकमा के जंगलों से निकलकर रायपुर तक पहुंचीं इन महिलाओं के लिए यह सफर उनके अतीत से निकलकर एक नई पहचान और बेहतर भविष्य की ओर बढ़ने की कहानी है। विभाग की पहल से यदि इन्हें प्रशिक्षण, उपकरण, बाजार और निरंतर मार्गदर्शन मिलता है, तो आने वाले समय में यही महिलाएं अपने हुनर के जरिए आत्मनिर्भर बनकर अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन सकती हैं।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के मार्गदर्शन में ग्रामोद्योग विभाग द्वारा की जा रही यह पहल आत्मसमर्पित महिलाओं को मुख्यधारा में शामिल करने के साथ-साथ बस्तर की पारंपरिक कला और हुनर को नई पहचान देने की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखी जा रही है।



