
चमन प्रकाश केयर (कुर्रे)
रायपुर/छत्तीसगढ़। राजधानी रायपुर के माना केंद्रीय रोपणी से जुड़ा कथित घोटाला अब प्रशासनिक लापरवाही से आगे बढ़कर “सिस्टमेटिक कवर-अप” का रूप लेता दिख रहा है। श्री कुँवारा देव महिला स्व-सहायता समूह के नाम पर हुए वित्तीय लेन-देन, गड़बड़ियों और विधानसभा में दी गई भ्रामक जानकारी ने सरकारी मशीनरी की पारदर्शिता पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।
▶ सदन में गुमराह करने का आरोप: सवाल 1254 का ‘भ्रामक’ जवाब
पूरा मामला विधानसभा के तारांकित प्रश्न क्रमांक 1254 से सामने आया, जिसमें वन विभाग द्वारा दी गई जानकारी जांच में पूरी तरह संदिग्ध पाई गई। जांच प्रतिवेदन में साफ उल्लेख है कि समूह के संचालन और फंड उपयोग से जुड़ी जानकारी तथ्यात्मक नहीं थी, बल्कि वास्तविक स्थिति को छुपाने का प्रयास प्रतीत होती है।
▶ जांच में दोष तय, कार्रवाई गायब: DFO पर क्यों ‘ढील’?
जांच रिपोर्ट में तत्कालीन वनमंडलाधिकारी (DFO) लोकनाथ पटेल को प्रमुख जिम्मेदारों में शामिल किया गया है। इसके बावजूद उनके खिलाफ न तो निलंबन हुआ, न ही विभागीय कार्रवाई की कोई ठोस पहल दिखाई दी।
इसके विपरीत, विभाग ने निचले स्तर के कर्मचारियों—सहायक ग्रेड और फील्ड स्टाफ—पर कार्रवाई करते हुए उन्हें निलंबित कर दिया। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या जिम्मेदारी ऊपर की थी और कार्रवाई नीचे कर दी गई?
▶ “कनेक्शन” का कवच? सियासी संरक्षण की चर्चा तेज
सूत्रों के अनुसार, संबंधित अधिकारी खुद को एक प्रभावशाली कैबिनेट मंत्री का करीबी बताते हैं। हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन इसी चर्चा ने पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया है।
यदि किसी भी स्तर पर राजनीतिक संरक्षण की भूमिका सामने आती है, तो यह प्रशासनिक निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर सकती है।
▶ फंड में गड़बड़ी के संकेत: रिकॉर्ड अधूरे, दस्तावेज संदिग्ध
जांच में वित्तीय अनियमितताओं के संकेत भी मिले हैं। समूह के माध्यम से हुए लेन-देन में कई दस्तावेज अधूरे पाए गए, जबकि कुछ रिकॉर्ड उपलब्ध ही नहीं थे।
बैंक स्टेटमेंट, भुगतान रसीदों और अन्य फाइलों में असंगतियां सामने आने से यह स्पष्ट होता है कि वित्तीय निगरानी में गंभीर कमी रही है। हालांकि, अंतिम निष्कर्ष विस्तृत जांच और आधिकारिक पुष्टि पर निर्भर करेगा।
▶ लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल: सदन में गलत जानकारी क्यों?
मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि गलत या भ्रामक जानकारी सीधे विधानसभा में प्रस्तुत की गई। जांच रिपोर्ट में इसे सदन के विशेषाधिकार से जुड़ा गंभीर मुद्दा माना गया है।
यदि जनप्रतिनिधियों को ही गलत तथ्य दिए जाएं, तो जवाबदेही और पारदर्शिता की व्यवस्था कमजोर पड़ती है—यही चिंता अब सामने आ रही है।
▶ कार्रवाई में असमानता: छोटे सस्पेंड, बड़े सुरक्षित?
इस पूरे घटनाक्रम में कार्रवाई के पैटर्न को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। निचले कर्मचारियों पर त्वरित कार्रवाई और उच्च अधिकारियों पर चुप्पी—यह असंतुलन प्रशासनिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर बहस छेड़ रहा है।
▶ आगे क्या? जांच, जवाबदेही और पारदर्शिता की परीक्षा
माना रोपणी प्रकरण अब सिर्फ एक विभागीय मामला नहीं रह गया है। यह शासन-प्रशासन की जवाबदेही, पारदर्शिता और निष्पक्षता की परीक्षा बन चुका है।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि जांच को किस दिशा में आगे बढ़ाया जाता है और क्या सभी स्तरों पर समान रूप से कार्रवाई होती है या नहीं।
हालांकि इस मामले में संबंधित रायपुर डीएफओ एल एन पटेल का पक्ष जानने के लिए उनके कार्यालय गए हुए थे लेकिन उनके द्वारा व्यस्तता होने का हवाला देकर किसी प्रकार से बात करने के लिए इंकार कर दिएl



