
16,491 करोड़ का कॉरिडोर: केशकाल के फेफड़ों पर कंक्रीट की आरी, सवालों के घेरे में करोड़ों के ‘एलिफेंट अंडरपास’
चमन प्रकाश l
[विशेष अन्वेषणात्मक रिपोर्ट – रायपुर/कांकेर] छत्तीसगढ़ के बस्तर की ओर जाने वाली राहों पर अब धूल और बारूद की गंध है। देश की सबसे महत्वाकांक्षी ‘भारतमाला परियोजना’ के तहत रायपुर (अभनपुर) से विशाखापट्टनम तक बन रहा सिक्सलेन इकोनॉमिक कॉरिडोर अपनी चमक बिखेरने को तैयार है। सरकार का दावा है कि यह छत्तीसगढ़ की किस्मत बदल देगा, व्यापार के द्वार खोलेगा और सफर के घंटों को मिनटों में बदल देगा। लेकिन, जब यह सड़क केशकाल और कांकेर के घने जंगलों, सदियों पुराने पहाड़ों और जैव-विविधता के बीच से गुजर रही है, तो यह ‘विकास बनाम विनाश’ की एक ऐसी बहस को जन्म दे रही है, जिसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है।

16,491 करोड़ रुपये की इस परियोजना में अकेले छत्तीसगढ़ के हिस्से में 4,146 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं, लेकिन क्या इस भारी-भरकम बजट की आड़ में पर्यावरण और स्थानीय हितों की अनदेखी की जा रही है?

सुरंग का रहस्य: पहाड़ों का सीना चीरकर क्या मिलेगा?
परियोजना का सबसे विवादित हिस्सा है—बसनवाही और मरांगपुरी के बीच बनाई जा रही 2.79 किलोमीटर लंबी सुरंग। यह सुरंग घने वन क्षेत्र और पहाड़ियों को काटकर बनाई जा रही है।
धरातल की हकीकत:
इंजीनियरिंग की दृष्टि से इसे एक उपलब्धि बताया जा रहा है, लेकिन पर्यावरणविदों का कहना है कि सुरंग निर्माण के लिए जिस बड़े पैमाने पर विस्फोट (Blasting) और ड्रिलिंग की जा रही है, उसने पहाड़ियों की आंतरिक संरचना को हिला दिया है। सुरंग के मलबे (Debris) का निस्तारण कहाँ हो रहा है, यह अब भी एक रहस्य बना हुआ है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि पहाड़ों को काटने से निकलने वाली मिट्टी और पत्थर प्राकृतिक नदी-नालों के प्रवाह को रोक रहे हैं।

सवाल: क्या इस सुरंग के बिना वैकल्पिक मार्ग नहीं खोजा जा सकता था? या फिर यह सिर्फ कंस्ट्रक्शन कंपनियों को फायदा पहुँचाने के लिए किया गया एक जटिल बदलाव है?
एलिफेंट अंडरपास: जब हाथी थे ही नहीं, तो रास्ता किसके लिए?
इस रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू ‘एलिफेंट अंडरपास’ है। विभाग ने करोड़ों रुपये खर्च कर वन्यजीवों के लिए अंडरपास बनाने का निर्णय लिया है।
आंकड़ों का खेल: स्थानीय ग्रामीणों और वन्यजीव जानकारों का कहना है कि पिछले 25-30 वर्षों में केशकाल और कांकेर के इस विशिष्ट गलियारे में हाथियों की नियमित आवाजाही का कोई प्रमाण नहीं है। हाथियों के झुंड आमतौर पर धरमजयगढ़ या सरगुजा बेल्ट में सक्रिय रहते हैं।
- विवादास्पद तर्क: केवल एक बार किसी हाथी के पैरों के निशान मिलने की अपुष्ट खबर को आधार बनाकर करोड़ों का ढांचा खड़ा कर दिया गया।
- आशंका: क्या यह वन्यजीव संरक्षण के नाम पर सरकारी खजाने की लूट है? जानकारों का मानना है कि जहाँ हाथियों को कॉरिडोर की ज़रूरत है, वहाँ कुछ नहीं बन रहा और जहाँ हाथी नहीं हैं, वहाँ ‘संरक्षण’ का ढोंग किया जा रहा है।
‘मंकी ब्रिज’—अनुसंधान या फिजूलखर्ची?
परियोजना में बंदरों के लिए विशेष ब्रिज बनाने की भी चर्चा है। भारत में मंकी ब्रिज का कॉन्सेप्ट अभी नया है और इसके सफल होने की दर बहुत कम है।
- वैज्ञानिक आधार का अभाव: क्या बंदर जमीन छोड़कर पुल का इस्तेमाल करेंगे? क्या इसके लिए किसी प्राणी विज्ञानी की सलाह ली गई?
- बजट का बोझ: बंदरों के लिए बनाए जा रहे इन पुलों की लागत लाखों में है, जबकि स्थानीय आदिवासी समुदायों को अपनी ज़मीन खोने के बदले में बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं मिल रही हैं।
गायब होते ‘गाँव’ और बेगाना होता ‘विकास’
सिक्सलेन की इस चकाचौंध में सबसे ज्यादा उपेक्षित वही लोग हैं, जिनके इलाके से यह गुजर रही है।
- साइन बोर्ड से गायब पहचान: जिस सड़क को आदिवासियों की ‘जीवनरेखा’ कहा जा रहा है, उस पर गाँवों के नाम और दिशा बताने वाले बोर्ड तक नहीं लगे हैं। यह दर्शाता है कि यह सड़क यहाँ के लोगों के लिए नहीं, बल्कि केवल ‘ट्रांजिट कॉरिडोर’ के रूप में बड़े औद्योगिक घरानों के ट्रकों के लिए बनाई गई है।
- स्थानीय रोजगार का शून्य: निर्माण कार्य में लगे अधिकांश श्रमिक और मशीन ऑपरेटर बाहर से आए हैं। स्थानीय युवाओं को केवल सुरक्षा गार्ड या अकुशल श्रम तक सीमित कर दिया गया है।
पारदर्शिता पर ताला: रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं?
एक 16 हजार करोड़ की परियोजना, जो हज़ारों एकड़ वन भूमि को लील रही है, उसकी ‘Environmental Impact Assessment’ (EIA) रिपोर्ट आम जनता की पहुँच से बाहर क्यों है?
- पेड़ों की गिनती: कागजों पर ‘न्यूनतम कटाई’ का दावा किया गया है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि हज़ारों साल पुराने पेड़ों को रातों-रात धराशायी किया गया।
- मुआवजे का पेंच: कई किसानों और आदिवासियों का आरोप है कि उनकी उपजाऊ ज़मीन को ‘बंजर’ दिखाकर कम मुआवजे पर कब्ज़ा किया गया है।
लागत का गणित: छत्तीसगढ़ पर इतना बोझ क्यों?
पूरे कॉरिडोर की कुल लंबाई के अनुपात में छत्तीसगढ़ का हिस्सा सबसे महंगा पड़ रहा है।
- तुलनात्मक अध्ययन: पड़ोसी राज्यों (ओडिशा और आंध्र प्रदेश) में प्रति किलोमीटर निर्माण लागत छत्तीसगढ़ की तुलना में कम है।
- कारण: क्या दुर्गम पहाड़ियों का बहाना बनाकर यहाँ टेंडर की दरों को कृत्रिम रूप से बढ़ाया गया है? भ्रष्टाचार की बू अब यहाँ के कंक्रीट में भी आने लगी है।
भविष्य का खतरा: क्या हम एक नई आपदा को आमंत्रण दे रहे हैं?
बस्तर के प्रवेश द्वार यानी केशकाल घाट की प्राकृतिक बनावट के साथ छेड़छाड़ का अंजाम भयावह हो सकता है।
- भूस्खलन (Landslides): पेड़ों की कटाई और पहाड़ों की कटिंग से मानसून के दौरान बड़े भूस्खलन का खतरा पैदा हो गया है।
- जैव-विविधता का अंत: कई दुर्लभ औषधीय पौधे और छोटे जीव इस निर्माण की भेंट चढ़ चुके हैं।
बड़ा सवाल : - सवाल सड़क का नहीं, नीयत का है
विकास किसी भी राज्य की आवश्यकता है, लेकिन क्या वह विकास इतना “अंधा” होना चाहिए कि वह अपनी ही जड़ों को काट दे? सफर का समय 2 घंटे कम करने के लिए क्या हज़ारों साल पुराने इकोसिस्टम की बलि देना तार्किक है?
भारतमाला परियोजना में पारदर्शिता का अभाव, अनावश्यक निर्माण कार्यों (अंडरपास/ब्रिज) पर बेतहाशा खर्च और स्थानीय समुदायों की अनदेखी इस प्रोजेक्ट को एक ‘इकोनॉमिक कॉरिडोर’ कम और ‘पर्यावरणीय आपदा’ अधिक बना रही है। सरकार और NHAI को अब इन तीखे सवालों का जवाब देना होगा, वरना यह सड़क भविष्य में केवल विकास की नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक गलती की गवाह बनकर रह जाएगी।
अधिकारियों से सीधे सवाल? - NHAI: हाथियों की अनुपस्थिति के बावजूद करोड़ों के अंडरपास का वैज्ञानिक आधार क्या है?
- वन विभाग: पेड़ों की कटाई के बदले जो वनीकरण (Afforestation) होना था, वह ज़मीन पर कहाँ है?
- स्थानीय प्रशासन: प्रभावित ग्रामीणों की जनसुनवाई में उनकी आपत्तियों को दरकिनार क्यों किया गया?
- राज्य सरकार: छत्तीसगढ़ के हिस्से में प्रोजेक्ट की लागत अन्य राज्यों से अधिक होने का तकनीकी स्पष्टीकरण क्या है?



